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पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन
ता. 19 अगस्त 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में आराध्ाकों की विशाल ध्ार्मसभा को संबोिध्ात करते हुए कहा- जब तक व्यक्ति परमात्म पद को प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक हर व्यक्ति अपूर्ण है। आंतरिक दृष्टि से पूर्ण होेने पर भ्ज्ञी क्रोध, मान आदि पडदे के कारण उसे अपनी पूर्णता का परिचय नहीं है। वह पूर्ण है, पर कर्मों से ढंका है।
आसक्ति आदि के कारण वह अपूर्ण है। पर अपनी अपूर्णता को ही पूर्ण मानकर अहंकार करता है। अहंकार ही व्यक्ति को कभी पूर्ण नहीं होने देता।
उन्होंने कहा- जो बीमार है, वह यदि चिकित्सक के सामने अपनी स्वस्थता की व्याख्या करेगा तो वह कैसे अपना इलाज करवा पायेगा। वह कभी भी स्वस्थ नहीं हो पायेगा। उसे यदि स्वस्थ होना है तो अपनी बीमारी का वर्णन करना पडेगा।
उन्होंने कहा- मैं अपूर्ण हूँ, ऐसा बोध उसे यथार्थता देता है और ऐसा बोध होते ही पूर्ण होने की प्रकि्रया का प्रारंभ हो जाता है। धर्म उसे पूर्ण बनाता है। धर्म का अर्थ है- अपनी यथार्थता का बोध! यहाँ पूर्णता से तात्पर्य शारीरिक विकास नहीं, बल्कि गुणों का विकास और दुर्गुणों का विनाश है। दुर्गुणों की उपस्थिति ही व्यक्ति को अपूर्ण बनाती है और आत्म वैभव का अपूर्व खजाना पास होने पर भी दरिद्रता के विचारों में डूबा रहता है।
उन्होंने कहा- आज व्यक्ति सामान्य वस्तुओं की प्राप्ति करके इतना अहंकारी बन गया है कि उसी में अपनी पूर्णता का अहसास करता है। यह एक तरह से सूखी घास को हरे रंग के चश्मे से देखकर उसमें हरी घारस देखने का प्रयत्न करने जैसा है। इससे सूखी घास हरी नहीं हो सकती। आज व्यक्ति अपनी अपूर्णता को दूर करने के बजाय ईष्र्या और द्वेषवश दूसरे में भी अपूर्णता थोपना चाहता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा- एक अंधा और एक लंगडा, दोनों एक दूसरे के मित्र और सहयोगी थे। एक रास्ता दिखाता और दूसरा चलता। इस प्रकार अपनी अपूर्णता को एक दूसरे से पूरा करते थे। वे दूसरे की पूर्णता की विशिष्टता स्वीकार करने के बजाय अपनी अपनी विशेषता को ही महत्व देते थ्ज्ञे। अंधा दूसरे की आंख को महत्व देने के बजाय अपनी चाल को महत्व देता था। और लंगडा दूसरे की चाल को महत्व देने के बजाय अपनी आंख को महत्व देता था। दोनों में एक दिन लडाई हुई। आरोप लगाये, मारपीट हुई। एक सिद्ध पुरूष उधर से गुजरा। उसने अंधे से कहा- बोलो, मैं तुम्हें क्या वरदान दूं। गुस्से में उसने कहा- मुझे कुछ नहीं चाहिये, इस लंगडे को अंधा कर दो। लंगडे ने सिद्ध पुरूष से कहा- इस अंधे को लंगडा कर दो।
सिद्ध पुरूष की कृपा से वे अपनी अपूर्णता पूर्ण कर सकते थे। पर चूंकि उनकी निगाहें दूसरे पर थी। इस कारण कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाये। यह उदाहरण ईष्र्या और द्वेष का प्रतीक है।
चातुर्मास प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- हर व्यक्ति को अपने व्यवहार की समीक्षा करनी चाहिये । मैं जो भी करता हूँ, बोलना, बैठना, चलना, करना आदि जो भी मेरी प्रवृत्ति है, उसका परिणाम मेरे लिये क्या होगा और साथ साथ इस बात का विचार करना भी जरूरी है कि मेरे व्यवहार का परिणाम मेरे परिवेश पर क्या होगा। उन्होंने कहा- व्यक्ति जंगली@ एकाकी प्राणी नहीं है, वह समाज में जीता है । समाज का अर्थ होता है । व्यक्ति जो भी करता है, निश्चित रूप से संपूर्ण समाज उससे प्रभावित होता है । उन क्षणों में यह विचार जरूरी है कि मैं सामाजिक परिणामों पर भी विवेक पूर्वक विचार करके अपने व्यवहार को संतुलित बनाउँ।
हरि विहार के अध्यक्ष संघवी विजयराज डोसी ने बताया कि चल रहे पंच दिवसीय महोत्सव के अन्तर्गत आज श्री सिद्धचक्र महापूजन का आयोजन किया गया। इसे पढाने के लिये परम विद्वान् श्रावक वर्य श्री विमलभाई शाह अहमदाबाद से पधारे। समारोह में उपस्थित होने के लिये सूरत, गांधीधाम, अहमदाबाद आदि शहरों से बडी संख्या में श्रद्धालु आये हैं।
पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. की 25वीं वर्धमान तप की ओलीजी की पूर्णाहुति पर वरघोडे का आयोजन किया गया।
आयोजक बाबुलाल लूणिया ने बताया कि पूजनीया साध्वी श्री विभांजनाश्रीजी म.सा. एवं श्रीमती मंजूदेवी ललवानी के मासक्षमण की महान् तपस्या के निमित्त कल सुबह भव्य वरघोडे का आयोजन किया जायेगा। बाद में तपस्वियों का अभिनंदन समारोह आयोजित होगा।
प्रेषक
दिलीप दायमा