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PARYUSHAN PARVA 7th DAY

पूज्य उपाध्यायश्री का प्रवचन
ता. 8 सितम्बर 2013, पालीताना
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूधर मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास पर्व के अन्तर्गत पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के सातवें दिन श्री जिन हरि विहार धर्मशाला में आराधकों व अतिथियों की विशाल धर्मसभा के मध्य आज प्रवचन फरमाते हुए कहा- जैन शासन में समर्पण और संवेदनशीलता का विशेष महत्व है। आज जैन इतिहास की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा- जैन परम्परा में सैंकडों आचार्य हुए हैं, जिन्होंने अहिंसा और कल्याण की बलिवेदी पर अपने प्राणों का विसर्जन कर दिया।
उन्होंने कहा- कष्टों को रोते हुए भोगने से वे बढते हैं और हंसते हंसते भोगने से उनकी परम्परा समाप्त हो जाती है।
उन्होंने परमात्मा आदिनाथ, नेमिनाथ एवं पाश्र्वनाथ के जीवन चरित्र की व्याख्या करते हुए कहा- इन तीर्थंकरों से राग व द्वेष की परम्परा के दुष्परिणाम समझने हैं और समझ कर राग व द्वेष का त्याग करना है। राग की परम्परा का परिणाम परमात्मा नेमिनाथ के भव हैं। और द्वेष की परम्परा का परिणाम पाश्र्वनाथ के भव हैं। किसी भी प्राणी को छोटी-सी अन्तराय देने पर उसका क्या दुष्परिणाम आता है, इसका बोध हमें परमात्मा आदिनाथ के जीवन से प्राप्त होता है। उन्होंने अपने पूर्व भव में एक बैल के मुंह पर छींका बांधा था, परिणाम स्वरूप उन्हें 400 दिनों तक आहार पानी उपलब्ध नहीं हुआ।
पूज्यश्री ने गौतमस्वामी, सुधर्मास्वामी आदि पट्ट परम्परा की विशद व्याख्या करते हुए आचार्य भगवंतों के योगदान की चर्चा की।
उन्होंने जैन धर्म के विभिन्न मतों की चर्चा करते हुए कहा- श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों परम्पराऐं एक ही भगवान महावीर की संतान हैं। साधना का क्रम इन परम्पराओं द्वारा ध्वनित हुआ है। ये दोनों परम्पराऐं पूर्व में क्रमश: स्थविरकल्प एवं जिनकल्प के नाम से जानी जाती है। दोनों में से किसी एक को प्राचीन कहना और दूसरी को अर्वाचीन कहना अनुचित होगा। ये दोनों ही साधना पद्धतियां भगवान महावीर की देन है।
उन्होंने जैन समाज की विभिन्न परम्पराओं के प्रारंभ का इतिहास सुनाते हुए कहा- खरतरगच्छ परम्परा का प्रारंभ आचार्य जिनेश्वरसूरि से वि. सं. 1075 में हुआ। जबकि अंचल गच्छ का प्रारंभ वि. सं. 1169 में आचार्य आर्यरक्षितसूरि से हुआ। तपागच्छ का प्रारंभ वि. सं. 1285 में आचार्य जगच्चंद्रसूरि से हुआ। पायछंद गच्छ का प्रारंभ 1575 में हुआ। स्थानक मत का प्रारंभ लोंका शाह से सोलहवीं शताब्दी के उत्तराद्ध में वि. 1531 से व तेरापंथ संप्रदाय का उद्भव आचार्य भीखणजी से वि 1816 में हुआ। जबकि तीन थुई का प्रारंभ आचार्य राजेन्द्रसूरि से लगभग 100 वर्ष पूर्व हुआ।
इस प्रकार श्वेताम्बर समाज अनेक गच्छों व संप्रदायों में बंटा। इसी प्रकार दिगम्बर समाज भी बीसपंथ, तेरापंथ, तारणपंथ, यापनीय संघ, मूल संघ, काष्ठा संघ आदि अनेक मत मतान्तरों में विभाजित हुआ।
उन्होंने कहा- वर्तमान में समाज के अग्रगण्यों को चाहिये कि उपरी कि्रयाओं के मतभेदों में न उलझ कर मूल मान्यताओं के एक स्वरूप पर ध्यान देकर जैन धर्म के सर्वांगीण विकास का प्रयास करें।
उन्होंने कहा- कुऐं का उपरी हिस्सा भले अलग अलग हो, पर भीतर बहने वाला पानी तो एक ही है। ठीक इसी प्रकार संप्रदायों की उपरी मान्यनाऐं भले ही अलग अलग हो, पर परमात्मा महावीर की मूल वाणी तो एक ही है।
चातुर्मास प्रेरिका पूजनीया बहिन म. डाँ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने कहा- सत्य एक है, उसे कहने के तरीके अलग अलग हो सकते हैं। उसी प्रकार जितने भी धर्म और संप्रदाय हैं, वे सभी अहिंसा और सत्य का ही पाठ पढाते हैं। हमें धर्म के नाम को नहीं बल्कि उनके सिद्धान्तों को मूल्य देना है। जहाँ सिद्धान्तों को मूल्य दिया जाता है, वहाँ परस्पर तमाम विवाद समाप्त होते हैं। वहाँ कभी भी लडाई नहीं हो सकती।
आयोजक बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा ने बताया कि पूज्यश्री के विशिष्ट प्रवचन श्रवण करने के लिये बाहर से भीड उमड रही है। पूज्यश्री के प्रवचनों की चर्चा पूरे पालीताणा में फैली हुई है। कल प्रात: साढे छह बजे बारसा सूत्र का वांचन किया जायेगा। तथा बाद में तपस्वियों के वरघोडे का आयोजन होगा।
प्रेषक-
-दिलीप दायमा