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Palitana Sammelan खरतरगच्छ के इतिहास का स्वर्णिम प्रसंग बना महासम्मेलन... नमस्कार महामंत्र के तीसरे पद पर आरूढ़ होते हुये गणाधीश मणिप्रभसागर से आचार्य जिनमणिप्रभसूरि बने।... प्रतिनिधि सभा की घोषणा भी हुयी...
| खरतरगच्छ के इतिहास का स्वर्णिम प्रसंग बना महासम्मेलन |
श्री खरतरगच्छ महासम्मेलन का सफलतम आयोजन संपन्न
विश्व विख्यात शाश्वत तीर्थ पालीताना में दि. 1 मार्च से 12 मार्च तक चल रहे अखिल भारतीय खरतरगच्छ महासम्मेलन की पूर्णता अंतिम दिन पूज्य खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरिजी महाराज के आचार्य पदारोहण के साथ हुयी। खरतरगच्छ महासम्मेलन का अंतिम दिन खरतरगच्छ के इतिहास का स्वर्णिम दिवस है। इस दिन नमस्कार महामंत्र के तीसरे पद पर आरूढ़ होते हुये गणाधीश मणिप्रभसागर से आचार्य जिनमणिप्रभसूरि बने। आचार्य पदारोहण समारोह का निर्देशन आचार्य विजयराजयशसूरिजी म., अचलगच्छाधिपति आचार्य गुणोदयसागरसूरिजी म. सहित अन्य कई आचार्य भगवंत की पावन निश्रा में हुआ। और लगभग 600 साधु साध्वी भगवंतों ने आचार्य पदवी समारोह में अपनी उपस्थिति देकर जैन समाज में एकता की मिशाल कायम की।
आचार्य पदवी प्रदाता
विजयराजयशसूरिजी म. ने अपने
उद्बोधन में कहा कि भारत भर की विशाल जनमेदिनी सहित विभिन्न आचार्य, उपाध्याय, साधु, साध्वी का पधारना यह खरतरगच्छ की एकता के साथ जैन
एकता का भी नया इतिहास है। इस अवसर पर भारत भर के समस्त श्री खरतरगच्छ संघों के पदाधिकारीयों,
ट्रस्टियों, अखिल भारतीय खरतरगच्छ युवा परिषद् की सभी शाखाओं के पदाधिकारियों
सहित हजारों कार्यकर्ताओं व विशिष्ट श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लेकर गच्छ व समुदाय के
प्रति अपनी आस्था प्रकट की।
इस महत्वपूर्ण व दूरगामी
परिणाम के लिये अखिल भारतीय खरतरगच्छ महासम्मेलन आयोजन समिति ने देश भर से आने वाले श्रद्धालुओं
के लिए आवास की सुन्दर व्यवस्था तीर्थ की लगभग विभिन्न 100 धर्मशालाओं में व्यवस्थित तरीके से की गई। दोनों समय के भोजन की व्यवस्था
हेतु एक विशाल भोजन मंडप बनाया गया जहां एक साथ 2500 लोग भोजन कर सकते थे। भारत भर से लगभग 20,000 से अधिक लोगों ने इस भव्य समारोह में भाग लिया।
सभी आगंतुकों ने सम्मेलन के आयोजन व व्यवस्था की मुक्त कंठ से सराहना की।
समारोह में खरतरगच्छाधिपति
श्री जिनमणिप्रभसागरसूरिजी महाराज ने सभा को संबोधित करते हुए कहा- परमात्मा महावीर
ने संघ की महिमा का गान किया है। संघ को कल्पवृक्ष और कामधेनु की उपमा दी है। संघ की
प्रगति के मूल में समर्पण छिपा है। जिस संघ के लोग अपने संघ और उसकी मर्यादा के प्रति
प्रामाणिक रूप से समर्पित रहते हैं, वह संघ दिन दूनी और रात चौगुनी प्रगति करता है। आज हम परम सौभाग्यशाली हैं कि परमात्मा
महावीर को 2500 वर्ष जितना लम्बा
समय व्यतीत हो जाने पर भी उनकी वाणी हमारे पास है। जिनवाणी से बडी दूसरी कोई संपदा
नहीं है। यह आचार्यों की परम्परा का उपकार है।
दि. 10 मार्च को प्रात: जिनहरि विहार धर्मशाला से शोभायात्रा
का आयोजन किया गया। जिसमें आचार्य विजयराजयशसूरिजी म., गणाधीश मणिप्रभसागरजी म., उपाध्याय भगवंत व मुनियों के समुह सहित तीर्थ में बिराजित अनेक
गुरुभगवंतों ने शोभायात्रा व समारोह में अपना सानिध्य प्रदान किया। शोभायात्रा में
हाथी, घोडे़, बेंड सहित अनेक झांकियों से युक्त था, जो तलेटी रोड पर जिनशासन और खरतरगच्छ का जय-जयकार
करता हुआ गिरिराज तलहटी पर पहुंचकर गिरिराज की आराधना में संलग्न हुआ।
दोपहर में सुखसागर
नगर के खचाखच भरे पांडाल में प्रारंभ में वरीष्ट सदस्यों ने दीप प्रज्वलन कर देव गुरु
वंदन कर सम्मेलन का विधिवत् प्रारंभ किया। जिसमें सर्वप्रथम आचार्य विजयराजयशसूरिजी म. ने मंगलाचरण
श्लोक का गान कर सम्मेलन व पदारोहण की शुभकामना दी। समिति के चेयरमेन श्री मोहनचंद
ढढा, प्राणीमित्र श्री कुमारपाल
भाई ने सम्मेलन की आवश्यकता पर बल देते हुये सभी का स्वागत किया।
पूज्य गणाधीश ने सभा
को संबोधित करते हुये कहा कि जैन धर्म में चतुर्विध संघ का अनुठा महत्व है। जिसमें
साधु साध्वी श्रावक और श्राविका का परिगणन किया गया है। जिस प्रकार रथ अपने चारों पहियों
के साथ ही सुरक्षित व गतिमान है वैसे ही धर्म भी इन चार संघों से सुरक्षित व पल्लवित
है। प्रभु महावीर भी देशना देने से पूर्व संघ को नमस्कार करते थे। उसी शिष्ट परंपरा
को मान्य कर आज भी संघ का उदात्त प्रभाव देखा जा रहा है। जिनवल्लभसूरि के संघपट्टक
ग्रंथ व सामाचारी शतक प्रकरण का आधार देकर कहा कि अनुशासन के बिना संघ की प्रगति
नहीं हो सकती। लगभग 60 वर्षों के बाद में
होने वाले इस सम्मेलन को सबको मिल कर पूर्ण रूप से सार्थक करना है। वर्षों बाद इतनी
बडी संख्या में साधु साध्वी एकत्र हुए हैं। हमें मिल कर मंथन करना है कि शासन व गच्छ
के कार्यों को आगे बढाते हुए हम अपनी आत्मा का कल्याण कैसे करें! इसके लिये हमें अपनी
नियमावली बनानी है। संपूर्ण देश को भारतीय संस्कृति की प्राचीन परम्पराओं व संस्कारों
से अवगत कराते हुए उनकी प्रतिष्ठा करने का बीडा उठाना है। पूज्य गुरुदेवश्री ने साधु
साध्वी सम्मेलन में लिये गये विभिन्न निर्णयों की घोषणा करते हुये कहा कि ये सभी नियम
समुदाय के समस्त साधु साध्वियों पर लागु किये गये है।
इस अवसर पर मुनि मनितप्रभसागरजी
म. द्वारा लिखित ‘साधना का ऐश्वर्य
चेतना का माधुर्य’ पुस्तक, साध्वी सौम्यगुणाश्रीजी म. द्वारा शोध से परिपूर्ण
23 पुस्तकों का विमोचन कुमारपाल
भाई सहित समारोह समिति के पदाधिकारियों के हाथों किया गया।
श्रावक-श्राविका सम्मेलन
के सत्र में खरतरगच्छ संघों के प्रतिनिधियों ने समाज कल्याण, धर्म उन्नति, गच्छ अभिवृद्धि सहित वर्तमान समय में चल रही विसंगतियों को खत्म
करने हेतु अपने विविध सुझाव दिये। विशेष सभा में श्रावकों के प्रश्नों का प्रत्युत्तर
गणाधीश भगवंत ने देकर सभी जिज्ञासाओं का शास्त्रीय समाधान प्रदान किया। सुझावों में
परिवारो में होने वाले सभी समारोहों में रात्रि भोजन बंद करने, बच्चों में जैन संस्कार हेतु पाठ्यक्रम एवं धार्मिक
शिक्षा पर जोर, साधु साध्वी की वैयावच्च,
दादावाडियों के सरक्षण, स्वाध्याय शिविरों पर जोर, संघ - युवा परिषद् - महिला परिषद् - बालिका परिषद् के साथ मिलकर
गच्छ को मजबूत बनाना, समर्पण की भावना से
हर कार्य करना आदि महत्वपूर्ण सुझाव दिये। इन सुझावों के आने पर लोगों ने हर्ष ध्वनि
से दादा गुरुदेव का जयकारा बोला।
इस कार्यक्रम को पारस
चैनल पर सीधा प्रसारित किया गया जिसे लाखों लोगों ने अपने घर बैठे देखकर अपने मन में
प्रमोद भावों का अनुभव किया एवं संचार सुविधाओं द्वारा मंगल कामना प्रेषित की।
खरतरगच्छ की दिव्यता,
भव्यता, ऐतिहासिकता एवं प्रखरता का दिग्दर्शन कर अखिल भारतीय जैन श्री
संघ अवाक् रह गया। इस समारोह से हजार वर्ष प्राचीन यह गच्छ परम प्रभावक सहस्रांशु की
भांति जाज्वल्यमान हुआ। इस आयोजन से पूरे भारत में खरतरगच्छ की महानता का शंखनाद हुआ।
सम्मेलन के मध्य आचार्य
जिनमणिप्रभसूरिजी म. आदि का आगामी चातुर्मास दुर्ग में होना तय हुआ। उपाध्याय मनोज्ञसागरजी
म. का चातुर्मास बालोतरा में, महत्तरा दिव्यप्रभाश्रीजी
म. का चातुर्मास पालीताणा में, प्रवर्तिनी शशिप्रभाश्रीजी
म. का चातुर्मास बाडमेर, गणिनी सुलोचनाश्रीजी
म. का चातुर्मास इचलकरंजी में, गणिनी सूर्यप्रभाश्रीजी
म. का चातुर्मास सूरत में, साध्वी विनोदश्रीजी
म. का चातुर्मास पाली में, साध्वी कल्पलताश्रीजी
म. का चातुर्मास शंखेश्वर में होना तय किया गया। इस समारोह की सफलता का श्रेय आयोजन
समिति एवं सकल खरतरगच्छ श्री संघों को जाता है। अखिल भारतीय खरतरगच्छ युवा परिषद् की
समस्त शाखाओं का योगदान भी सराहनीय रहा।
प्रतिनिधि सभा की
घोषणा
पूज्य गुरुदेव आचार्य
श्री जिनमणिप्रभसूरिजी म. ने अपने उद्बोधन में फरमाया- अखिल भारतीय स्तर पर खरतरगच्छ
की एक प्रतिनिधि संस्था होनी चाहिये जिसमें भारत के समस्त खरतरगच्छ संघों का उचित प्रतिनिधित्व
हो, जिसमें व्यक्तिगत सदस्यता
न होकर संघों की सदस्यता हो।
पूज्यश्री ने इस हेतु
श्री अखिल भारतीय जैन श्वे. खरतरगच्छ प्रतिनिधि सभा की घोषणा की। तथा इसके विधान,
प्रारूप व संघों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने
के लिये दो व्यक्तियों के नामों की घोषणा की। श्री मोहनचंदजी ढड्ढा चेन्नई इस संस्था
के संयोजक तथा श्री मोतीचंदजी झाबक रायपुर को उप संयोजक बनाया गया। ये शीघ्र ही आगे
की कार्यवाही कर विधि विधान के साथ इस प्रतिनिधि सभा का गठन करेंगे।
प्रेषक
गौतम संकलेचा, चैन्नई
094440 45407
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