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पूज्य उपाध्याय गुरुदेवजी श्री का प्रवचन
जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने आज श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला के अन्तर्गत चल रहे चातुर्मास के विशाल आराध्ाकों की ध्र्मसभा को संबोधित करते हुए कहा- परमात्मा के पास हमें याचक बन कर नहीं, अपितु प्रेमी बन कर जाना होता है। जो याचक बन कर जाता है, वह कुछ प्राप्त करता है और जो प्रेमी बन कर जाता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है।
बाबुलाल लूणिया एवं रायचंद दायमा परिवार की ओर से आयोजित चातुर्मास आयोजन के अन्तर्गत उन्होंने कहा- हम सभी बीमार है। हमारी बीमारी कोई एक दिन की नहीं है, अपितु जन्मों जन्मों की है। जन्मों जन्मों से हमारी यात्रा का प्रवाह जारी है। यही सबसे बडी बीमारी है। इस जगत में चार प्रकार के व्यक्ति है। एक वे जो बीमार तो हैं, पर अपनी बीमारी का बोध्ा नहीं है। दूसरे वे जिन्हें अपनी बीमारी के बारे सिर्फ पता है। उसके आगे कुछ नहीं। तीसरे वे जिनके मन में अपनी बीमारी को दूर करने का भाव है। चैथे वे जो अपनी बीमारी को दूर करने के लिये पुरूषार्थ कर रहे हैं।
हमें अपने बारे में निर्णय करना है कि हम किस श्रेणी के हैं। यह बीमारी कर्मों की है... मिथ्यात्व की है। इस जगत में करोडों लोग ऐसे हैं, जिन्हें अपनी बीमारी का बोध्ा ही नहीं है। वे व्यक्ति ही अपनी बीमारी से मुक्त हो पाते हैं जो उसे दूर करने का पुरूषार्थ करते हैं।
उन्होंने भक्तामर स्तोत्र का उदाहरण देते हुए कहा- पुरूषार्थ का क्षण अद्वितीय होता है। उसमें इतनी शक्ति है कि वह जन्मों जन्मों के पाप पल भर में समाप्त कर देता है। अंध्ोरा कितना भी गहरा क्यों न हो, उसे दूर करने के लिये सूर्य की एक किरण पर्याप्त है। उसी प्रकार जो व्यक्ति हृदय से परमात्मा की भक्ति करता है, उसकी एक क्षण की भक्ति पापों के विशाल ढेर को नष्ट कर देती है।
उन्होंने कहा- श्रीमद् देवचन्द्रजी महाराज प्रथम आदिनाथ प्रभु के स्तवन में यही बात फरमाते हैं, जो हृदय से परमात्मा से प्रेम करता है, वह सदा सदा भक्त नहीं बना रहता बल्कि वह भगवान बन जाता है। वह परमात्मा के समकक्ष हो जाता है।
पूज्य मुनि श्री मोक्षप्रभसागरजी म. सा. ने पूज्य गुरुदेव उपाध्यायश्री का परिचय विस्तार से दिया। उन्होंने कहा- पूज्य गुरुदेवश्री परम सरल स्वभावी एवं आराध्ाक मुनि है। वे समता के सागर है।
पूजनीया बहिन म. डाॅ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ने दोपहर में प्रवचन फरमाते हुए कहा- दो ध्ााराऐं हैं, एक प्रभुता की और दूसरी पशुता की। मानव जीवन एक ऐसा केन्द्र है, जहाॅं से अपनी प्रवृत्तियों द्वारा वह दोनों ही दिशाओं में मुड सकता है। वह प्रभुता की दिशा में भी कदम बढा सकता है और वह चाहे तो पशुता की ओर भी अग्रसर हो सकता है।
उन्होंने कहा- हममें अनन्त क्षमताऐं विद्यमान है। चैतन्य अनंत शक्ति का स्वामी है। पदार्थवादी दृष्टिकोण विकसित करके हमने अपने चैतन्य की उपेक्षा कर दी है। अगर हम चैतन्य पर ध्यान केन्द्रित करें तो प्रभुता की ओर गतिशील हो सकते हैं। अगर हम अपनी वृत्तियाॅं मलीन या अशुद्ध कर दें तो हमारे भीतर के स्राव भी अशुद्ध हो जायेंगे। तब हम पशुता की ओर बढ जायेंगे।
उन्होंने कहा- प्रभु का आलंबन हमें जगाता है। हमारे जीवन की क्रियाओं और आचरणों को बदलता है। पदार्थ का आलंबन पशु बनाता है और प्रभु का आलंबन हमें प्रभु बनाता है।
आज पूजनीया साध्वी श्री विभांजनाश्रीजी म.सा. के 19 वें उपवास की शाता सकल श्री संघ ने पूछी। चातुर्मास आयोजक बाबुलाल लूणिया ने बताया कि ता. 16 सितम्बर से जो उपध्ाान तप का प्रारंभ हो रहा है, उसमें अध्ािक से अध्ािक आराध्ाकों को भाग लेकर तपस्या करनी है।
आयोजक रायचंद दायमा ने भक्ति गीत व गुरूगुण गीत गाया। मालेगांव से पध्ाारे श्री जिनकुशलसूरि दादावाडी बाडमेर संघ का अभिनंदन किया गया।
प्रेषक
दिलीप दायमा
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