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अपने घर की याद ही समझदारी है

- उपाध्याय मणिप्रभसागर
पालीताणा, जैन श्वे. खरतरगच्छ संघ के उपाध्याय प्रवर पूज्य गुरूदेव मरूध्ार मणि श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. ने आज श्री जिन हरि विहार ध्ार्मशाला में उपधान तप की आराधना के अंतर्गत प्रवचन फरमाते हुए कहा- अब हमें अपने घर की याद आने लगी है। मेरा कोई घर है, यह तो मैं लम्बे समय से जानता हूॅं। पर अभी तक पाया नहीं है। इसे पाने के लिये मैंने यात्रा तो बहुत की है। पर मिला अभी तक नहीं है।
मुश्किल यह है कि जब भी अपने चारों ओर देखता हूॅं, तो अपने आपको वहीं का वहीं पाता हूॅं, जहाॅं से यात्रा का प्रारंभ हुआ था।
हाॅंलाकि मैंने अपनी यात्रा का प्रारंभ तो अपने घर को पाने के लिये ही किया था। पर अटक गया बीच रास्ते में!
बहुत अवरोध है मार्ग है! बहुत भय है रास्ते में! बहुत प्रलोभन भी है! और मैं इन सब में उलझ गया हूॅं। कभी कभार पल दो पल के लिये जागता हूॅं तो फिर किसी न किसी प्रलोभन में फॅंस जाता हूॅं। और फिर एक लम्बी नींद ले लेता हूॅं! फिर वहीं का वहीं पहुॅंच जाता हूॅं, जहाॅं से यात्रा का प्रारंभ किया था।
इस बार संकल्प लेकर आगे बढता हूॅं! कोई मुझे कितना ही ललचाये... कोई मुझे कितना ही उलझाये... कोई मुझे कितना ही भरमाये... पर मैं सावधान रहूॅंगा! नहीं फॅंसूंगा।
पर मैं हूॅं कि फिर फॅंसता ही चला जाता हूॅं! कीचड में धॅंसता ही चला जाता हूॅं!
कभी नाम के प्रलोभन में, कभी मकान दुकान के चक्कर में, कभी परिवार के चक्कर में! और ये सब मुझे ांधे रहते हैं। मैं हिल भी नहीं पाता, इनके आदेश के बिना। ये जिधर मुझे चलाते हैं, मैं चल देता हूॅं। मैं इनके बारे में ही सोचता हूॅं। और जब मैं इनके बारे मेें सोचता हूॅं तब अपने बारे में सोचना बंद कर देता हूॅं।
दोनों सोच एक साथ संभव नहीं है। इन्हें याद रखना ही अपने आप को भूलना है। और जो अपने आप को याद रखता है, उसे ये सब याद नहीं आते। उसे केवल अर्जुन की भाॅंति अपनी मंजिल दिखाई देती है। प्रलोभन और भय की स्थितियाॅं उसे भी उपलब्ध होती है। पर वह अटकता नहीं है। वह सीधा चलता है। चलता ही रहता है तब तक.. जब तक वह पा नहीं लेता... पहुॅंच नहीं जाता! उपधान आयोजक श्री बाबुलाल लुणिया व रायचंद दायमा ने सभी मेहमानों का आभार माना और सभी मेहमानों का अभिनंदन किया।
प्रेषक- दिलीप दायमा
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