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40. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.
जटाशंकर को बैंक में पहरेदारी
की नौकरी मिली थी। होशियार था तो कम, पर अपने आप को समझता ज्यादा था।
शाम के समय में बैंक मैनेजर ने
अपने सामने ताला लगवाया। उस पर सील लगवाई और चौकीदार जटाशंकर से कहा- ध्यान रखना! सील
कोई तोड न दें। पूरी रात चौकीदारी करना।
जटाशंकर ने अपनी मूंछों पर अकडाई
के साथ हाथ फेरते हुए कहा- आप जरा भी चिंता न करें। इस सील का बाल भी बांका नहीं होने
दूंगा।
दूसरे दिन सुबह बैंक मैनेजर ने
आकर देखा तो पता लगा कि रात लुटेरों ने बैंक को लूंट लिया है। क्रोध में उसने जटाशंकर
को बुलाया और कहा- क्या करते रहे तुम रात भर! यहाँ पूरी बैंक ही लुट गई।
जटाशंकर ने कहा- हजूर! आपने मुझे
सील की सुरक्षा का कार्य सौंपा था। मैंने उसे पूरी तरह सुरक्षित रखा है। आप देख लें।
पर चोर तो दीवार में सेंध मार
कर भीतर घुसे हैं।
- हुजूर! यह तो मैं देख रहा था।
दीवार को तोडते भी देखा, अंदर जाते भी देखा, सामान लूटते भी देखा, सामान ले जाते भी
देखा।
- तो फिर हाथ पर हाथ धरे बैठे
रहे, उन्हें रोकना नहीं था!
- हुजूर! आपने मुझे सील की सुरक्षा
की जिम्मेवारी सौंपी थी। मैं इधर उधर कैसे जा सकता था!
मैनेजर ने अपना माथा पीट लिया।