12 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म सा.
दो
चींटियाँ आपसे में बाते करती हुई चली जा रही थी। अन्य चींटियों से थोड़ी
बडी भी थी और ताक़तवर भी। किसी ने उनका नाम जटाशंकर और घटाशंकर रखा था।
अपनी ताकत का अहंकार भी मानस में था। सामने से एक हाथी चला आ रहा था। हाथी
के विशाल आकार को देखा तो चीटिंयां अपने मन में अपनी लघुता के कारण हीन भाव
का अनुभव करने लगी।
उस हीन भाव से प्रेरित अंहकार भाव में डूबकर एक
चींटी हाथी से कहने लगी- खा खा कर बड़े मोटे हुए जा रहे हो। कुछ ताकत भी है
या नहीं, या यों ही वादी से भरें हो। हमसे लडोगे?
हाथी कुछ बोला नहीं। दूसरी चींटी ने उसे मौन देख पहली चींटी से कहने लगी।
छोड़ो
बेचारे को! देखो कैसा घबरा रहा है। अरे वो बिचारा अकेला है, अपन दो है।
छोड़ो। लडाई बराबर वालो में की जाती है। यह अकेला बिचारा अभी भाग जायेगा।
यह
अपने मुँह मिट्ठू बनने का उदाहरण हैं। बहुत बार हम अपने थोथे अहं का
प्रदर्शन उसके लिये करते हैं जो हकीकत में हमारे पास नहीं होता।