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Jatashankar by Maniprabhsagar•

44 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा.

By JAHAJMANDIR
जटाशंकर के घर कुछ काम था। एक बडा गड्ढा खुदवाना था। उसने मजदूर रख लिया और काम सौंप कर अपने काम पर चला गया। उसने सोचा था कि जब मैं शाम घर पर जाउँगा, तब तक काम पूरा हो ही जायेगा। शाम जब घर पर लौटा तो उसने देखा कि मजदूर ने गड्ढा तो बिल्कुल ही नहीं खोदा है।
उसने डाँटते हुए कहा- पूरा दिन बेकार कर दिया... तुमने कोई काम ही नहीं किया! क्या करते रहे दिन भर!
मजदूर ने जवाब दिया- हुजूर! गड्ढा खोदने का काम मैं शुरू करने ही वाला था कि अचानक एक प्रश्न दिमाग में उपस्थित हो गया। आपने गड्ढा खोदने का तो आदेश दे दिया पर जाते जाते यह तो बताया ही नहीं कि गड्ढे में से निकलने वाली मिट्टी कहाँ डालनी है? इसलिये मैं काम शुरू नहीं कर पाया और आपका इन्तजार करता रहा।
जटाशंकर ने कहा- इसमें सोचने की क्या बात थी? अरे इसके पास में एक और गड्ढा खोद कर उसमें मिट्टी डाल देता!
उधर से गुजरने वाले लोग जटाशंकर की इस बात पर मुस्कुरा उठे।
हमारा जीवन भी ऐसा ही है। एक गड्ढे को खोदने के लिये दूसरा गड्ढा खोदते हैं फिर उसकी मिट्टी डालने के लिये तीसरा गड्ढा खोदते हैं। यह काम कभी समाप्त ही नहीं होता।
संसार की हमारी क्रियाऐं ऐसी ही है। हर जीवन नये जीवन का कारण बनता है। साध्ाक तो वह है जो जीवन अर्थात् जन्म मरण की इतिश्री करता है।