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Jatashankar by Maniprabhsagar

45. जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म.सा

By JAHAJMANDIR

जटाशंकर सिगरेट बहुत पीता था। उसकी पत्नी उसे बहुत समझाती थी। सिगरेट पीने से केंसर जैसी बीमारी हो जाती है! फेफडे गल जाते हैं! घर में थोडा धूआँ फैल जाय तो दीवार कितनी काली हो जाती है! फिर सिगरेट का धुआँ अपने पेट में डालने पर हमारा आन्तरिक शरीर कितना काला हो जाता होगा! धूऐं की वह जमी हुई परत मौत का कारण हो सकती है। इसलिये आपको सिगरेट बिल्कुल नहीं पीनी चाहिये।
एक दिन जटाशंकर की पत्नी अखबार पढ रही थी। उसमें सिगरेट से होने वाले नुकसानों की विस्तार से व्याख्या की गई थी। वह दौडी दौडी अपने पति के पास गई और हर्षित होती हुई कहने लगी- देखो! अखबार में क्या लिखा है? सिगरेट पीने से कितना नुकसान होता है?
जटाशंकर ने अखबार हाथ में लेते हुए कहा- कहाँ लिखा है! जरा देखूं तो सही!
उसने अखबार पढा! पत्नी सामने खडी उसके चेहरे के उतार चढाव देखती रही!
कुछ ही पलों के बाद जटाशंकर जोर से चिल्लाया- आज से बिल्कुल बंद! कल से बिल्कुल नहीं!
पत्नी अत्यन्त हर्षित होती हुई बोली- क्या कहा! कल से सिगरेट पीना बिल्कुल बंद! अरे वाह! मजा आ गया।
जटाशंकर चिल्लाते हुए बोला- अरी बेवकूफ! सिगरेट बंद का किसने कहा! मैं अखबार बंद करने का कह रहा हूँ!
सिगरेट के विरोध में ऐसा छापते हैं! ऐसे अखबार को हरगिज नहीं मंगाना है। न तुम पढोगी, न तुम मुझे बंद करने के लिये कहोगी!
अखबार बंद करने से सिगरेट की खराबी छिप नहीं जाती। विकारों को ही देशनिकाला देना होता है। यही जिन्दगी का सम्यक् परिवर्तन है।