← Back to Blogs
Jatashankar by Maniprabhsagar•

27 जटाशंकर -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

By JAHAJMANDIR
27 जटाशंकर      -उपाध्याय मणिप्रभसागरजी म. सा.

10 वर्षीय जटाशंकर एक बगीचे में घुस आया था। बगीचे के बाहर प्रवेश निषिद्ध का बोर्ड लगा था। फिर भी वह उसे नजर अंदाज करके एक पेड के नीचे खडे होकर फल बटोर रहा था। उसने बहुत सावधानी बरती थी कि चौकीदार कहीं उधर न आ जाये।
हाँलाकि उसने पहले काफी ध्यान दिया था कि चौकीदार वहाँ है या नहीं! आता है तो कब आता है... कब जाता है।
दीवार फाँद कर वह उतर तो गया था, पर कुछ ही देर बाद चौकीदार वहाँ आ गया था। उसने जटाशंकर को जब फल एकत्र करते देखा तो चौकीदार ने अपना डंडा घुमाया और जोर से चिल्लाया- क्या कर रहे हो? फल तोडते शर्म नहीं आती!
जटाशंकर घबराते हुए बोला- नही हुजूर! मैं तो ये फल जो नीचे गिर गये थे, इन्हें वापस चिपका रहा था।
चौकीदार गुस्से में चीखा- शर्म नहीं आती झूठ बोलते हुए! अभी चल मेरे साथ! तुम्हारे पिताजी से शिकायत करता हूँ। कहाँ है तुम्हारे पिताजी!
जटाशंकर हकलाते हुए बोला- जी! पिताजी तो इसी पेड पर चढे हुए हैं। उन्होंने ही तो सारे फल तोड कर नीचे गिराये हैं।
चौकीदार अचंभित हो उठा।
जहाँ पिताजी स्वयं अनैतिक कार्य करते हो, वहाँ पुत्र को क्या कहा जा सकता है। उसे संस्कारी बनाने की बात हवा में महल बनाने जैसी होगी। संस्कारों का प्रारंभ स्वयं से होता है।