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"प" की महीमा
‘प’ शब्द हमको बहुत प्रिय है। हम जिंदगी भर ‘प’ के पीछे भागते रहते है। जो मिलता है वह भी ‘प’ और जो नहीं मिलता वह भी ‘प’।
पति- पत्नी- पुत्र -पुत्री -परिवार-
पैसा -पद-प्रतिष्ठा -प्रशंसा।
ये सब ‘प’ के पीछे पड़ते-पड़ते हम पाप करते
है यह भी ‘प’ है। फिर हमारा ‘प’ से पतन
होता है और अंत मे बचता है सिर्फ ‘प’ से पछतावा।
पाप के ‘प’ के पीछे पड़ने से अच्छा है 'प' से पुण्य करके "प" के परमात्मा की ‘प’ से प्राप्ति करले..।''